Letter to Faiz | Mujhse Pehli Si Mohabbat | Jyoti Mamgain

Letter to Faiz for his nazm Mujhse Pehli Si Mohabbat by the young age poet Jyoti Mamgain.

मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग ।
और भी दुख है जमाने में मोहब्बत के शिवा,
रहते और भी हैं वस्ल की राहत के शिवा ।
लौट जाती है उधार को भी नज़र क्या किजिये,
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या किजिये ।
मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग ।

Letter to Faiz | Mujhse Pehli Si Mohabbat | Jyoti Mamgain

तो अब लगता है कि कोई पूछे की ऐसा क्या हुआ फैज ?

किस बात ने परशान किया ? तुमने हाथ क्या उठा लिया मोहब्बत से,

मोहब्बत ने कितनो पर हाथ उठा दिया। अच्छे खाशे काम काज़ी घर जा बैठे,

और निकम्मो ने लिख लिख कर

इतना नाम कमा लिया। 


तोह कोई पूछे की ऐसा क्या हुआ फैज़ ?

जो जवानी मिलती है बर्बाद होने को,

उसमे खामखां क्यों आज़ाद हो गए ?

दो बातें की, चार शेर लिखे, 

हमें तोः ले डूबे,और ख़ुद आबाद हो गए !


कुछ तोः हुआ होगा,

कुछ देखा होगा नज़रो ने,

नहीं तोः कीसी ने कुछ कहा ज़रूर होगा।

दिल बड़ा था तुम्हारा,

मुश्किल था किसी गैर का

सारी मोहब्बत लूट कर ले जाना,

दिल में चोर तुम्हारे भी रहा ज़रूर होगा।   

तोह कोई पूछे की ऐसा क्या हुआ फैज़ ?

जो डूबे रहते थे कभी,

क्यों धसने, झटपटाने लगे बाहों में उनकी ?

अपनी एक, उनकी एक, धड़कनों की चादर बुनी

झटके से उधेड़ कर फिर क्यों चले गए साँसों से उनकी ?


तुम कहते हो नज़र लौट गयी तुम्हारी,

चलो ये भी माना,

जब किसी के ज़ख्म नासूर बन गए होंगे,

ज़मीर दुखने लगा होगा,

शब्द छील गये होंगे,

ईमान झुकने लगा होगा,

तब नज़रें तैर गयी होंगी सनम की आँखों मे।


यूँ अश्क किनारा कर गये,

तुम इश्क़ में फिर पढ़ गये,

की गिर पढ़े,

तुम रो दिए, 

तुम रोने से कतराते थे,

हस्ते थे हालातों पर,

तुम है कर भी पछताते थे।


किस बात ने हैरान किया ?

मखमल में लिपटी लाशों ने,

बची खुची कुछ साँसों ने, 

इंसानो ने, हैवानो ने,

मुर्दा सी नन्ही जानो ने !

किस बात ने हैरान किया ?  


मज़हब और धर्म ने जब बाँट लिया इंसानो को,

काट दिया, दो टुकड़ो में,

और नाम दिया शैतानो  को।


वो बन्दे नहीं थे अल्लाह के,

वो काफिर थे। 

भक्त नहीं वो भटके हुए मुसाफिर थे।


खुदा परास्त लोगों को जब

खुदा नहीं मिला तोः उन्होंने

दिल छोटा कर लिया। 

छोटे दिलों से मोहब्बत नहीं हुई

और उन्होंने क्या किय,

मोहब्बत को मार दिया।

जुबां खींच ली, शब्द काट दिए,

सोच रौंध दी, जिस्म बाँट दिए,

कुचल कर चले गये जज़्बात सारे,

पैर मोहब्बत पे भी पढ़ गया !


फिर कहते क्या न करते फैज़,

तुमने भी इंकार किया.

जैसे थे, ज़िंदा तोः थे

ये इश्क़ विष्क बेकार किया। 


बड़ी ज़िल्लत है इश्क़ में,

बड़ी हिम्मत करनी पड़ती है ,

इतनी इतनी खुशियों की भी

कीमत भरनी पड़ती है।


तुम्हारी ही तरह मुझे भी

कभी रास नहीं आयी मोहब्ब। 

कभी कोई अपना होता है तोः फ़र्ज़ मोहब्बत,

कभी मांगली गैर से तोः क़र्ज़ मोहब्बत,

कभी हाल चाल पूछने के पीछे सवाल मोहब्बत,

कभी जवाब में हाँ सुनने का ख्वाब मोहब्बत।


मोहब्बत न हुई, मुसीबत हो गयी.

मैंने किनारा तोः कर लिया पर,

कभी हसीं आँखों के इशारे, 

कभी किसी होठों के सहारे

इक तरफ़ा में जीत गये,

कभी दोनों तरफों से हारे हार गये.

ज़माने के रंज ओ ग़म ने हराय।


मोहब्बत हुई भी तोः मिली नहीं,

मिली तोः बड़ी देर से।

जब मिली तब तक

ये जाहिल अपनी माशूकाओं को

सब दे आये।

चाँद के टुकड़े कर दिए

सारे तारे दे आये,

फूल नोच कर ले गये,

साड़ी बहारें दे आये।


धुप भर ले गये जेबों में,

बारिशें उनके नाम कर दी,

इन् कमबख़्तो ने पी पी के,

शराब भी हराम कर दी।


आशिकी मौसिकी शायरी

लफ़्ज़ों का ढेर लगा आये ye

अब ज़्यादा से ज़्यादा वो भी क्या करती,

न कर देती न?

मेरे हिस्से की ज़िल्लत भी उठा आये ये।


तोह कुछ इसलिए भी खुदा खैरात में

चाँद लोग दे दिया करता है। 

क्यूंकि वो समझता है,

वो समझता है की

आशिकी जितनी म्हणत गर खुदा

अपने हर रिश्ते में करवाए,

तोः तक तक कर इज़हार-इ-मोहब्बत में

मिया उसके बन्दों के घुटने घिस जाएँ। 


तोह ये जान लो की 

दिन काम हैं और लोग बहत,

उम्र भर का साथ नहीं

नफरत को क्या चाहिए,

दो बातें काफी हैं !

पर मोहब्बत हर किसी के,

बस की बात नहीं.


तुम जाओ, एक उम्र पढ़ी है

आगे निभाने को।

पर शायद मैं न कर पौन ये सब कभी

क्यूंकि मोहब्बत के सारे फ़र्ज़, सारे दर्द,

सारे शौक एक बार मिलें तोः हीं,

जायज़ लगते हैं.


क्यों लिखा मालूम नहीं पर क्या खूब लिखा है फैज़,

"मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग

 मुझसे पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब ना मांग "


........The End.......

Letter to Faiz Video:


Narrator/writer: Jyoti Mamgain


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